Monday, 26 November 2012



  • स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ shared a photo.
    सुप्रभात
- सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
के लोगों को आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
- खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
- चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
- सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
के लिए चुन ले .
- हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
- शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
- सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
- चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
- चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
- राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
हम दूध डाल के ले सकते है .
- जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
(जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
देनी चाहिए .
- चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
है .
- चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
- दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
- चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
के नाम कर सके .
- जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
- आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .
    सुप्रभात
    - सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
    अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
    के लोगों को 
    आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
    प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
    भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
    क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
    - खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
    - चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
    डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
    - सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
    इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
    लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
    के लिए चुन ले .
    - हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
    - शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
    - सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
    - चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
    - चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
    - राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
    सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
    लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
    डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
    हम दूध डाल के ले सकते है .
    - जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
    (जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
    देनी चाहिए .
    - चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
    साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
    है .
    - चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
    - दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
    - चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
    के नाम कर सके .
    - जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
    हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
    - आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .


  • स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ shared a photo.
    सुप्रभात
- सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
के लोगों को आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
- खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
- चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
- सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
के लिए चुन ले .
- हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
- शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
- सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
- चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
- चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
- राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
हम दूध डाल के ले सकते है .
- जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
(जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
देनी चाहिए .
- चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
है .
- चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
- दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
- चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
के नाम कर सके .
- जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
- आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .
    सुप्रभात
    - सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
    अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
    के लोगों को 
    आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
    प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
    भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
    क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
    - खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
    - चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
    डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
    - सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
    इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
    लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
    के लिए चुन ले .
    - हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
    - शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
    - सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
    - चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
    - चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
    - राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
    सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
    लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
    डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
    हम दूध डाल के ले सकते है .
    - जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
    (जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
    देनी चाहिए .
    - चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
    साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
    है .
    - चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
    - दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
    - चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
    के नाम कर सके .
    - जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
    हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
    - आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .


  • स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ shared a photo.
    सुप्रभात
- सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
के लोगों को आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
- खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
- चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
- सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
के लिए चुन ले .
- हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
- शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
- सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
- चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
- चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
- राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
हम दूध डाल के ले सकते है .
- जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
(जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
देनी चाहिए .
- चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
है .
- चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
- दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
- चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
के नाम कर सके .
- जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
- आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .
    सुप्रभात
    - सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
    अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
    के लोगों को 
    आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
    प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
    भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
    क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
    - खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
    - चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
    डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
    - सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
    इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
    लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
    के लिए चुन ले .
    - हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
    - शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
    - सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
    - चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
    - चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
    - राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
    सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
    लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
    डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
    हम दूध डाल के ले सकते है .
    - जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
    (जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
    देनी चाहिए .
    - चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
    साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
    है .
    - चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
    - दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
    - चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
    के नाम कर सके .
    - जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
    हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
    - आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .


  • स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ shared a photo.
    सुप्रभात
- सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
के लोगों को आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
- खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
- चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
- सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
के लिए चुन ले .
- हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
- शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
- सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
- चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
- चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
- राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
हम दूध डाल के ले सकते है .
- जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
(जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
देनी चाहिए .
- चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
है .
- चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
- दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
- चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
के नाम कर सके .
- जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
- आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .
    सुप्रभात
    - सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
    अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
    के लोगों को 
    आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
    प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
    भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
    क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
    - खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
    - चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
    डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
    - सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
    इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
    लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
    के लिए चुन ले .
    - हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
    - शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
    - सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
    - चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
    - चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
    - राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
    सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
    लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
    डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
    हम दूध डाल के ले सकते है .
    - जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
    (जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
    देनी चाहिए .
    - चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
    साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
    है .
    - चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
    - दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
    - चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
    के नाम कर सके .
    - जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
    हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
    - आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .


  • स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ shared a photo.
    सुप्रभात
- सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
के लोगों को आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
- खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
- चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
- सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
के लिए चुन ले .
- हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
- शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
- सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
- चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
- चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
- राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
हम दूध डाल के ले सकते है .
- जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
(जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
देनी चाहिए .
- चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
है .
- चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
- दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
- चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
के नाम कर सके .
- जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
- आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .
    सुप्रभात
    - सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के
    अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . वात या पित्त प्रवृत्ति
    के लोगों को 
    आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात
    प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); थायरोइड के मरीजों को
    भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक
    क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .
    - खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .
    - चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य
    डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
    - सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .
    इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि
    लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय
    के लिए चुन ले .
    - हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए
    - शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .
    - सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .
    - चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .
    - चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .
    - राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गए
    सूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
    लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी
    डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें
    हम दूध डाल के ले सकते है .
    - जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय
    (जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
    देनी चाहिए .
    - चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके
    साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
    है .
    - चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .
    - दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
    - चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
    के नाम कर सके .
    - जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप
    हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
    - आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .


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आज हम और आप कम्पुयटरी युग के हिसाब से परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के योग को स्वदेशी विचारों में समझने की कोशिश करेंगे।
कम्पुयटर को मुख्य रूप से दो प्रमुख बातें हमारे समझने में सहयोग करती हैं
1---हार्ड्वेयर
2---सोफ़्टवेयर
कम्पुयटर पढ़ाई भी इन दो पहलूओं के इर्द-गिर्द घुमती दिखाई देती है।
हार्ड्वेयर उन कम्पुयटर पार्टस को कहते हैं जो हाथ से छुए जा सकते हैं अर्थात जो ठोस रुप में होते हैं और जो स्थान घेरते हैं और वजन रखते हैं।जैसे :--स्क्रीन, स्पीकर,प्रोससैर आदि।हम कह सकते हैं कि हार्डवेयर कम्पुटर का ढ़ाँचा है बेस है जैसे मानव का कंकाल ।
सोफ़्टवेयर कम्पुयटर में अहम भूमिका निभाता है आप को मैं सरल शब्दों में कहूँ तो जैसे मानव शरीर में जान का स्थान है वही कम्पुयटर में सोफ़्टवेयर का है।जैसे बिना जान के मानव का ढ़ाँचा मुर्दा कहलाता है उसी तरह कम्पुयटर भी बिना सोफ़्टवेयर के मुर्दा ही होता है।
सोफ़्टवेयर को हम इस तरह परिभाषित कर सकते हैं कि जैसे वायु जिसे हम छू नहीं सकते हैं पर महसूस कर सकते हैं।इनका वजन नहीं होता है,न ही ये ठोस रुप में होते हैं और अगर सोफ़्ट की हम हिन्दी बनाएं तो बनेगी ---कोमल
जब हम हार्डवेयर और सोफ़्टवेयर को मिला देते हैं तो कम्पुयटर जीवित हो उठता है। जैसे जान शरीर में कार्य करती है जान है तो जहान है।
अब हम मूल विषय पर आते हैं---------------------------------------------------------------------------------------------योग को भी हम दो पहलू में बाँट कर समझने की कोशिश करेंगे।
1---व्यायाम
2—प्राणायाम
1-- व्यायाम ये एक ऐसी विधि है जिसके नित्य रोज करने से हम अपने हार्डवेयर को ठीक रख सकते हैं,व्यायाम को हम अंग्रेजी भाषा में एक्सैरसाईज भी कहते हैं और आज के हम इण्डियन लोग इसे इसी नाम से जानते हैं। मेरे शब्दों में व्यायाम का सम्बन्ध हार्डवेयर से है हमारा बाहरी दिखाई देने वाला मानव शरीर अंगीय ढ़ाँचा जिसे मैं हार्डवेयर कह रहा हूँ इसे हम व्यायाम करके सही रख सकते हैं । आजकल बहुत सारे नवयुवकों ने जिम ज्वाँईन कर रखे हैं और बाहरी हार्डवेयर को इसके सहारे से मजबूत और सुडोल बनाने की चेष्टा करते हैं। पहले जमाने में व्यायाम शालाएं होती थी जिनमें युवक दण्ड लगाते थे और बैठक लगाते थे आसन करते थे जिन्हें हम योगासन के नाम से जानते हैं।
लेकिन यह सब हमारे बाहरी अंगों को ही सहयोग करता है इसकी सहायता से हम और आप अपने बाहरी ढ़ाँचे को ही स्वस्थ और मजबूत रख सकते है।
2—प्राणायाम ये एक ऐसा अदभूत और इश्वरीय विज्ञान है जिसका सम्बन्ध हमारे शरीर के सोफ़्टवेयर से है। आप समझ गये होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ? हमारे मानव शरीर में कम्पुयटर की ही तरह से कुछ सोफ़्टवेयर जैसा है जिसे हम छु नहीं सकते हैं और उस सोफ़्टवेयर पर हार्डवेयर को मरम्मत करने वाले साधन काम नहीं आते हैं और जो कोमल होते हैं,सोफ़्ट होते हैं।
मैं आप को साफ़ कर देना चाहता हूँ कि ये मानव शरीर सोफ़्टवेयर के नाम इस प्रकार हैं:----दिमाग,फ़ेफ़ड़े,गुर्दे,आँतें,लीवर,दिल,बच्चादानी
ये इस प्रकार के अंग हैं जिनको हम छू नहीं सकते हैं और कोमल हैं इसलिए मैने इन्हें सोफ़्टवेयर की संज्ञा दी है।कोई भी जिम प्रक्रिया या व्यायाम प्रक्रिया इन अंगों को अभ्यास देकर मरम्मत देने का कार्य नहीं कर सकती है,केवल मात्र ये शक्ति प्राणायाम में है ।
अब आप और हम प्राणायाम की कुछ विशेष क्रियाओं के बारे में विचार करते हैं।
कपाल भांति----- इस योग क्रिया के करने के ढ़ंग को आप ध्यान से समझेंगे तो पाएंगे कि, जी ये तो सच में हमारे सोफ़्टवेयर को अभ्यास देकर मरम्मत प्रदान करने का कार्य करती हुई नजर आ रही है।जब हम कपाल भांति करते हैं तो हम इस तरह से शुरुवात करते हैं कि जैसे नाक में मक्खी घुस गई हो और उसे जोर से बाहर फ़ेंकना है तो जैसे ही आप ऐसा करते हैं तो आप के जन्नांगो से लेकर आपके दिमाग तक एक झटका लगता है जो हमारे सभी सोफ़्टवेयरों को अभ्यास कराता महसूस होता है। आप करेंगे तो आप भी महसूस कर पाएंगे। एक बात तो निश्चित है कि इस योग क्रिया के इलावा पूरी दूनिया में कोई उपाय नहीं है जो हमारे सोफ़्टवेयर को मसाज दे सके । शायद आपको मेरी इस सरल भाषा के कारण प्राणायाम की महत्वता समझने में सहायता हो रही होगी। इस योग के करने से ह्रदय आघात,गुर्दे असफ़ल,फ़ेफ़ड़े निष्क्रिय,अपाचन,आंत्र रोग,सैक्स समस्याएं आदि बीमारियां होती ही नहीं हैं।
2—लोम-विलोम ----इस योग क्रिया के करने के ढ़ंग को आप ध्यान से समझेंगे तो पाएंगे कि ये क्रिया हमारे उन सोफ़्टवेयर को मरम्मत कर रही है जिसे किसी अन्य तरीके से इतने सरल स्वभाव में लाभ नहीं पहुंचाया जा सकता है।
जब हम इस प्रक्रिया को करना आरम्भ करते हैं तो सबसे पहले हम एक नाक का सुराक अपने हाथ के अंगूठे से बन्द कर लेते हैं और बिना बन्द सुराक से स्वास को अन्दर खेंचते हैं और फ़िर 3 सैकण्ड के बाद दूसरे से आहिस्ता समभाव से छोड़ते हैं और अबकी बार दुसरे सुराक को बन्द करते हैं और जिस से स्वास छोड़ा था उस से खेंचते है ऐसा लगातार करते रहना ही लोम-विलोम योग क्रिया का होना होता है।
अब हम बात करते हैं कि ये योग क्रिया हमारे लिए क्या करती है? जब हम इस क्रिया को करते हैं तो हमारे फ़ेफ़ड़ों में आक्सीजन प्रचुर मात्रा में पहुंच जाती है और साथ-साथ हमारे फ़ेफ़ड़ों की आक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता भी बढ़ती है ,ज्यादा आक्सीजन हमारे खौन में मिलती है और जिससे हमारे जीन मरम्मत होने का कार्य होने लगता है। ध्यान रहे कि हम सारा दिन और रात सामान्य तौर पर बहुत कम आक्सीजन ग्रहण करते हैं जो हमारे शरीर के अन्दरुनी क्रिया कलाप के लिए कम पड़ती है। जिस कारण हमारे खौन को पूरी आक्सीजन नहीं मिल पाती है इसलिए हमारे जीन विकृता को धारण करने लगते हैं जिसके कारण हमें कैन्सर और दिमागी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। जब हमारे शरीर को पूरी आक्सीजन मिलने लगती है तो हमारे बहुत से रोग दूर होने लगते हैं और हमारे अनेक सोफ़्टवेयरों को लाभ पहुंचने लगता है।
3------बस दोस्तो मैं बात तो और योग क्रियाओं पर भी कर सकता हूँ पर लेख बहुत लम्बा हो जायेगा । आप समझ ही गये होंगे कि योग का हमारे शरीर के लिए क्या महत्व है और हमारे सोफ़्टवेयर को केवल एक ही विज्ञान सहायता दे सकता है और वह है योगगुरु बाबा रामदेव जी का योग।लेख अच्छा लगे तो पेज लाईक करें।


आज हम और आप कम्पुयटरी युग के हिसाब से परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के योग को स्वदेशी विचारों में समझने की कोशिश करेंगे।
कम्पुयटर को मुख्य रूप से दो प्रमुख बातें हमारे समझने में सहयोग करती हैं
1---हार्ड्वेयर
2---सोफ़्टवेयर
कम्पुयटर पढ़ाई भी इन दो पहलूओं के इर्द-गिर्द घुमती दिखाई देती है।
हार्ड्वेयर उन कम्पुयटर पार्टस को कहते हैं जो हाथ से छुए जा सकते हैं अर्थात जो ठोस रुप में होते हैं और जो स्थान घेरते हैं और वजन रखते हैं।जैसे :--स्क्रीन, स्पीकर,प्रोससैर आदि।हम कह सकते हैं कि हार्डवेयर कम्पुटर का ढ़ाँचा है बेस है जैसे मानव का कंकाल ।
सोफ़्टवेयर कम्पुयटर में अहम भूमिका निभाता है आप को मैं सरल शब्दों में कहूँ तो जैसे मानव शरीर में जान का स्थान है वही कम्पुयटर में सोफ़्टवेयर का है।जैसे बिना जान के मानव का ढ़ाँचा मुर्दा कहलाता है उसी तरह कम्पुयटर भी बिना सोफ़्टवेयर के मुर्दा ही होता है।
सोफ़्टवेयर को हम इस तरह परिभाषित कर सकते हैं कि जैसे वायु जिसे हम छू नहीं सकते हैं पर महसूस कर सकते हैं।इनका वजन नहीं होता है,न ही ये ठोस रुप में होते हैं और अगर सोफ़्ट की हम हिन्दी बनाएं तो बनेगी ---कोमल
जब हम हार्डवेयर और सोफ़्टवेयर को मिला देते हैं तो कम्पुयटर जीवित हो उठता है। जैसे जान शरीर में कार्य करती है जान है तो जहान है।
अब हम मूल विषय पर आते हैं---------------------------------------------------------------------------------------------योग को भी हम दो पहलू में बाँट कर समझने की कोशिश करेंगे।
1---व्यायाम
2—प्राणायाम
1-- व्यायाम ये एक ऐसी विधि है जिसके नित्य रोज करने से हम अपने हार्डवेयर को ठीक रख सकते हैं,व्यायाम को हम अंग्रेजी भाषा में एक्सैरसाईज भी कहते हैं और आज के हम इण्डियन लोग इसे इसी नाम से जानते हैं। मेरे शब्दों में व्यायाम का सम्बन्ध हार्डवेयर से है हमारा बाहरी दिखाई देने वाला मानव शरीर अंगीय ढ़ाँचा जिसे मैं हार्डवेयर कह रहा हूँ इसे हम व्यायाम करके सही रख सकते हैं । आजकल बहुत सारे नवयुवकों ने जिम ज्वाँईन कर रखे हैं और बाहरी हार्डवेयर को इसके सहारे से मजबूत और सुडोल बनाने की चेष्टा करते हैं। पहले जमाने में व्यायाम शालाएं होती थी जिनमें युवक दण्ड लगाते थे और बैठक लगाते थे आसन करते थे जिन्हें हम योगासन के नाम से जानते हैं।
लेकिन यह सब हमारे बाहरी अंगों को ही सहयोग करता है इसकी सहायता से हम और आप अपने बाहरी ढ़ाँचे को ही स्वस्थ और मजबूत रख सकते है।
2—प्राणायाम ये एक ऐसा अदभूत और इश्वरीय विज्ञान है जिसका सम्बन्ध हमारे शरीर के सोफ़्टवेयर से है। आप समझ गये होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ? हमारे मानव शरीर में कम्पुयटर की ही तरह से कुछ सोफ़्टवेयर जैसा है जिसे हम छु नहीं सकते हैं और उस सोफ़्टवेयर पर हार्डवेयर को मरम्मत करने वाले साधन काम नहीं आते हैं और जो कोमल होते हैं,सोफ़्ट होते हैं।
मैं आप को साफ़ कर देना चाहता हूँ कि ये मानव शरीर सोफ़्टवेयर के नाम इस प्रकार हैं:----दिमाग,फ़ेफ़ड़े,गुर्दे,आँतें,लीवर,दिल,बच्चादानी
ये इस प्रकार के अंग हैं जिनको हम छू नहीं सकते हैं और कोमल हैं इसलिए मैने इन्हें सोफ़्टवेयर की संज्ञा दी है।कोई भी जिम प्रक्रिया या व्यायाम प्रक्रिया इन अंगों को अभ्यास देकर मरम्मत देने का कार्य नहीं कर सकती है,केवल मात्र ये शक्ति प्राणायाम में है ।
अब आप और हम प्राणायाम की कुछ विशेष क्रियाओं के बारे में विचार करते हैं।
कपाल भांति----- इस योग क्रिया के करने के ढ़ंग को आप ध्यान से समझेंगे तो पाएंगे कि, जी ये तो सच में हमारे सोफ़्टवेयर को अभ्यास देकर मरम्मत प्रदान करने का कार्य करती हुई नजर आ रही है।जब हम कपाल भांति करते हैं तो हम इस तरह से शुरुवात करते हैं कि जैसे नाक में मक्खी घुस गई हो और उसे जोर से बाहर फ़ेंकना है तो जैसे ही आप ऐसा करते हैं तो आप के जन्नांगो से लेकर आपके दिमाग तक एक झटका लगता है जो हमारे सभी सोफ़्टवेयरों को अभ्यास कराता महसूस होता है। आप करेंगे तो आप भी महसूस कर पाएंगे। एक बात तो निश्चित है कि इस योग क्रिया के इलावा पूरी दूनिया में कोई उपाय नहीं है जो हमारे सोफ़्टवेयर को मसाज दे सके । शायद आपको मेरी इस सरल भाषा के कारण प्राणायाम की महत्वता समझने में सहायता हो रही होगी। इस योग के करने से ह्रदय आघात,गुर्दे असफ़ल,फ़ेफ़ड़े निष्क्रिय,अपाचन,आंत्र रोग,सैक्स समस्याएं आदि बीमारियां होती ही नहीं हैं।
2—लोम-विलोम ----इस योग क्रिया के करने के ढ़ंग को आप ध्यान से समझेंगे तो पाएंगे कि ये क्रिया हमारे उन सोफ़्टवेयर को मरम्मत कर रही है जिसे किसी अन्य तरीके से इतने सरल स्वभाव में लाभ नहीं पहुंचाया जा सकता है।
जब हम इस प्रक्रिया को करना आरम्भ करते हैं तो सबसे पहले हम एक नाक का सुराक अपने हाथ के अंगूठे से बन्द कर लेते हैं और बिना बन्द सुराक से स्वास को अन्दर खेंचते हैं और फ़िर 3 सैकण्ड के बाद दूसरे से आहिस्ता समभाव से छोड़ते हैं और अबकी बार दुसरे सुराक को बन्द करते हैं और जिस से स्वास छोड़ा था उस से खेंचते है ऐसा लगातार करते रहना ही लोम-विलोम योग क्रिया का होना होता है।
अब हम बात करते हैं कि ये योग क्रिया हमारे लिए क्या करती है? जब हम इस क्रिया को करते हैं तो हमारे फ़ेफ़ड़ों में आक्सीजन प्रचुर मात्रा में पहुंच जाती है और साथ-साथ हमारे फ़ेफ़ड़ों की आक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता भी बढ़ती है ,ज्यादा आक्सीजन हमारे खौन में मिलती है और जिससे हमारे जीन मरम्मत होने का कार्य होने लगता है। ध्यान रहे कि हम सारा दिन और रात सामान्य तौर पर बहुत कम आक्सीजन ग्रहण करते हैं जो हमारे शरीर के अन्दरुनी क्रिया कलाप के लिए कम पड़ती है। जिस कारण हमारे खौन को पूरी आक्सीजन नहीं मिल पाती है इसलिए हमारे जीन विकृता को धारण करने लगते हैं जिसके कारण हमें कैन्सर और दिमागी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। जब हमारे शरीर को पूरी आक्सीजन मिलने लगती है तो हमारे बहुत से रोग दूर होने लगते हैं और हमारे अनेक सोफ़्टवेयरों को लाभ पहुंचने लगता है।
3------बस दोस्तो मैं बात तो और योग क्रियाओं पर भी कर सकता हूँ पर लेख बहुत लम्बा हो जायेगा । आप समझ ही गये होंगे कि योग का हमारे शरीर के लिए क्या महत्व है और हमारे सोफ़्टवेयर को केवल एक ही विज्ञान सहायता दे सकता है और वह है योगगुरु बाबा रामदेव जी का योग।लेख अच्छा लगे तो पेज लाईक करें।



बिल्व (बेल)
कहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व ।' अर्थात् रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है । इसके अन्य नाम हैं-शाण्डिल्रू (पीड़ा निवारक), श्री फल, सदाफल इत्यादि । मज्जा 'बल्वकर्कटी' कहलाती है तथा सूखा गूदा बेलगिरी ।

वानस्पतिक परिचय-
सारे भारत में विशेषतः हिमालय की तराई में, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 4 हजार फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत 
में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है ।
15 से 30 फीट ऊँचे कँटीले वृक्ष फलों से लदे अलग ही पहचान में आ जाते हैं । पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं । स्वाद में वे तीखे होते हैं । गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं । फल अलगे वर्ष मार्च से मई के बीच आ जाते हैं । फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं । सुगंध इनकी मन को भाने वाली होती है । फल 5 से 17 सेण्टीमीटर व्यास के होते हैं । खोल (शेल) कड़ा व चिकना होता है । पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है । खोल को तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है । बीज छोटे, बड़े व कई होते हैं ।
बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए । दोनों के गुण समान हैं । जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं ।

शुद्धाशुद्ध परीक्षा पहचान-
बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है । इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह 10-15 खण्डों में विभक्त सा मालूम होता है, जिनमें प्रत्येक में 6 से 10 बीज होते हैं । ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं । प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है । कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है ।

संग्रह-संरक्षण एवं कालावधि-
छोटे कच्चे बेल के फलों का संग्रह कर, उन्हें अच्छी तरह छीलकर गोल-गोल कतरे नुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुख बंद डिब्बों में नमी रहती शीतल स्थान में रखना चाहिए । औषधि प्रयोग हेतु जंगली बेल ही प्रयुक्त होते हैं । खाने, शर्बत आदि के लिए ग्राम्य या लाए हुए फल ही प्रयुक्त होते हैं । इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है ।

गुण-कर्म संबंधी विभिन्न मत-

आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है । फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है । आर्युवेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी बहुत अधिक लाभदायक है ।

चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं । बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है । डॉ. खोटी लिखते हैं कि बेल का फल बवासीर रोकता व कब्ज की आदत को तोड़ता है । आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है ।

डॉ. नादकर्णी ने इसे गेस्ट्रोएण्टेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोपो (महामारी) में अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है । विषाणु के प्रभाव को निरस्त करने तक की इसमें क्षमता है । डॉ. डिमक के अनुसार बेल का फल कच्ची व पकी दोनों ही अवस्थाओं में आँतों को लाभ करता है । कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेण्ट) होता है तथा अपने टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है । पुरानी पेचिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है । पका फल, हलका रेचक होता है । रोग निवारक ही नहीं यह स्वास्थ्य संवर्धक भी है ।

पाश्चात्य जगत् में इस औषधि पर काफी काम हुआ है । डॉ. एक्टन एवं नोल्स ने 'डीसेण्ट्रीस इन इण्डिया' पुस्तक में तथा डॉ. हेनरी एवं ब्राउन ने 'ट्रान्जेक्सन्स ऑफ रॉयल सोसायटी फॉर ट्रापिकल मेडीसन एण्ड हायजीन' पत्रिका में बेल के गुणों का विस्तृत हवाला दिया है एवं संग्रहणी, हैजे जैसे संक्रामक मारक रोगों के लिए बेल के गूदे को अन्य सभी औषधियों की तुलना में वरीयता दी है । ब्रिटिश फर्मेकोपिया में इसके तीन प्रयोग बताए गए हैं-ताजे कच्चे फल का स्वरस 1/2 से 1 चम्मच एक बार, सुखाकर कच्चे बेल के कतलों का जल निष्कर्ष 1 से 2 चम्मच दो बाद, बिल्व चूर्ण 2 से 4 ग्राम । ये सभी प्रकारांतर से संग्रहणी व रक्तस्राव सहित अतिसार में तुरंत लाभ करते हैं । पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने बेल के छिलके के चूर्ण को 'कषाय' मानते हुए ग्राहीगुण का पूरक उसे माना है व गूदे तथा छिलके दोनों के चूर्ण को दिए जाने की सिफारिश की है । पुरानी पेचिश में जहाँ रोगी को कभी कब्ज होता है, कभी अतिसार, अन्य औषधियाँ काम नहीं करतीं । ऐसे में बिल्व काउपयोग बहुत लाभ देता है व इस जीर्ण रोग से मुक्ति दिलाता है ।

बेल में म्यूसिलेज की मात्रा इतनी अधिक होती है कि डायरिया के तुरंत बाद वह घावों को भरकर आंतों को स्वस्थ बनाने में पूरी तरह समर्थ रहती हैं । मल संचित नहीं हो पाता और आँतें कमजोर होने से बच जाती हैं ।
होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं । खूनी बवासीर व पुरानी पेचिश में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । अलग-अलग पोटेन्सी में बिल्व टिंक्चर का प्रयोग कर आशातीत लाभ देखे गए हैं ।
यूनानी मतानुसार इसका नाम है-सफरजले हिन्द । यह दूसरे दर्जे में सर्द व तीसरे में खुश्क है । हकीम दलजीतसिंह के अनुसार बेल गर्म और खुश्क होने से ग्राही है व पेचिश में लाभकारी है ।

रासायनिक संगठन-
बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं । ये हैं-म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स । इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं-मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है । इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (करीब 12 प्रतिशत) भी रेचक होता है । शकर 4.3 प्रतिशत, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त 2 प्रतिशत भस्म भी होती है । भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं । बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं । कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं ।

आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोग निष्कर्ष-
पेक्टिन जो बिल्व मज्जा का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, एक प्रामाणिक ग्राही पदार्थ है पेक्टिन अपने से बीस गुने अधिक जल में एक कोलाइडल घोल के रूप में मिल जाता है, जो चिपचिपा व अम्ल प्रधान होता है । यह घोल आँतों पर अधिशोषक (एड्सारवेण्ट) वं रक्षक (प्रोटेक्टिव) के समान कार्य करता है । बड़ी आँत में पाए जाने वाले मारक जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमताभी इस पदार्थ में है । डॉ. धर के अनुसार बेल मज्जा के घटक घातक विषाणुओं के विरुद्ध मारक क्षमता भी रखते हैं । 'इण्डियन जनरल ऑफ एक्सपेरीमेण्टल वायोलॉजी' (6-241-1968) के अनुसार बिल्व फल हुकवर्म जो भारत में सबसे अधिक व्यक्तियों को प्रभावित करता पाया गया है, को मारकर बाहर निकाल सकने में समर्थ है । पके फल को वैज्ञानिकों ने बलवर्धक तथा हृदय को सशक्त बनाने वाला पाया है तो पत्र स्वरस को सामान्य शोथ तथा मधुमेह में एवं श्वांस रोग में लाभकारी पाया है ।
आयुर्वेद के अनुसार बिल्ववृक्ष के सात पत्ते प्रतिदिन खाकर थोड़ा पानी पीने से स्वप्न दोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में काम आता है।

शास्त्रों में बताया गया है जिन स्थानों पर बिल्ववृक्ष हैं वह स्थान काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र है। ऐसी जगह जाने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

बिल्वपत्र उत्तम वायुनाशक, कफ-निस्सारक व जठराग्निवर्धक है। ये कृमि व दुर्गन्ध का नाश करते हैं। इनमें निहित उड़नशील तैल व इगेलिन, इगेलेनिन नामक क्षार-तत्त्व आदि औषधीय गुणों से भरपूर हैं। चतुर्मास में उत्पन्न होने वाले रोगों का प्रतिकार करने की क्षमता बिल्वपत्र में है।

ध्यान रखें इन कुछ तिथियों पर बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। ये तिथियां हैं चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति और सोमवार तथा प्रतिदिन दोपहर के बाद बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। ऐसा करने पर पत्तियां तोडऩे वाला व्यक्ति पाप का भागी बनता है।

शास्त्रों के अनुसार बिल्व का वृक्ष उत्तर-पश्चिम में हो तो यश बढ़ता है, उत्तर-दक्षिण में हो तो सुख शांति बढ़ती है और बीच में हो तो मधुर जीवन बनता है।

घर में बिल्ववृक्ष लगाने से परिवार के सभी सदस्य कई प्रकार के पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं। इस वृक्ष के प्रभाव से सभी सदस्य यशस्वी होते हैं, समाज में मान-सम्मान मिलता है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।
ग्राह्य अंग-
फल का गुदा एवं बेलगिरी । पत्र, मूल एवं त्वक् (छाल) का चूर्ण । चूर्ण के लिए कच्चा, मुरब्बे के लिए अधपका एवं ताजे शर्बत के लिए पका फल लेते हैं । कषाय प्रयोग हेतु मात्र दिन में 2 या 3 बार ।

स्वरस-
10 से 20 मिलीलीटर (2 से 4 चम्मच) ।

शरबत-
20 से 40 मिलीलीटर (4 से 8 चम्मच) । पाचन संस्थान मं प्रयोग हेतु मूलतः बिल्व चूर्ण ही लेते हैं । कच्चा फल अधिक लाभकारी होता है । इसीलिए चूर्ण को शरबत आदि की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है ।

निर्धारणानुसार प्रयोग-मूल अनुपान शहद या मिश्री की चाशनी होते हैं ।
दाँत निकलते समय जब बच्चों को दस्त लगते हैं, तब बेल का 10 ग्राम चूर्ण आधा पाव पानी में पकाकर, शेष 20 ग्राम सत्व को 5 ग्राम शहद में मिलाकर 2-3 बार दिया जाता है । पुरानी पेचिश व कब्जियत में पके फल का शरबत या 10 ग्राम बेल 100 ग्राम गाय के दूध में उबालकर ठण्डा करके देते हैं । संग्रहणी जब खून के साथ व बहुत वेगपूर्ण हो तो मात्र कच्चे फल का चूर्ण 5 ग्राम 1 चम्मच शहद के साथ 2-4 बार देते हैं । कब्ज व पेचिश में पत्र-स्वरस लगभग 10 ग्राम 2-3 घंटे के अंतर से 4-5 बार दिए जाने पर लाभ करता है । हैजे की स्थिति में बेल का शरबत या बिल्व चूर्ण गर्म पानी के साथ देते हैं ।
कोष्ठबद्धता में सायंकाल बेल फल मज्जा, मिश्री के साथ ली जाती है । इसमें मुरब्बा भी लाभ करता है । अग्निमंदता, अतिसार व गूदा गुड़ के साथ पकाकर या शहद मिलाकर देने से रक्तातिसार व खूनी बवासीर में लाभ पहुँचाता है । पके फल का जहाँ तक हो सके, इन स्थितियों में प्रयोग नहीं करना चाहिए । इसकी ग्राही क्षमता अधिक होने से हानि भी पहुँच सकती है । कब्ज निवारण हेतु पका फल उपयोगी है । पत्र का स्वरस आषाढ़ व श्रावण में निकाला जाता है, दूसरी ऋतुओं में निकाला गया रस उतना लाभकारी नहीं होता । काली मिर्च के साथ दिया गया पत्रस्वरस पीलिया तथा पुराने कब्ज में आराम पहुँचाता है । हैजे के बचाव हेतु भी फल मज्जा प्रयुक्त हो सकती है ।

अन्य उपयोग-
आँखों के रोगों में पत्र स्वरस, उन्माद-अनिद्रा में मूल का चूर्ण, हृदय की अनियमितता में फल, शोथ रोगों में पत्र स्वरस का प्रयोग होता है ।
श्वांस रोगों में एवं मधुमेह निवारण हेतु भी पत्र का स्वरस सफलतापूर्वक प्रयुक्त होता है । विषम ज्वरों के लिए मूल का चूर्ण व पत्र स्वरस उपयोगी है । सामान्य दुर्बलता के लिए टॉनिक के समान प्रयोग करने के लिए बेल का उपयोग पुराने समय से ही होता आ रहा है । समस्त नाड़ी संस्थान को यह शक्ति देता है तथा कफ-वात के प्रकोपों को शांत करता है ।

ज्यादा लाभ एव जानकारी के लिए ये दोनो वीडीयो देखे
https://www.youtube.com/watch?v=9TDtA7DQ_xo&feature=relmfu
https://www.youtube.com/watch?v=lhubogwU_Vs

Sunday, 25 November 2012

That's All I Really Wanna Do Song | Teri Meri Kahaani | Shahid Kapoor, P...



गीली हल्दी ---
इन दिनों बाज़ार में गीली हल्दी उपलब्ध होती है जो दिखने में अदरक की तरह होती है . इसके सेवन के कई लाभ है ----
- इसमें करक्यूमिन होता है जो केंसर से लड़ता है . इसलिए केंसर के रोगी इसका रस सुबह खाली पेट अवश्य ले .
- यह बुढापे से दूर रखता है . अंदरूनी चोटों को भी ठीक करता है .
- इसका एक टुकडा मुंह में रखने से गले की खराश , खांसी , ज़ुकाम , दमा आदि दूर होता है .
- दिन गीली हल्दी मिले , खाना बनाने में इसी को कद्दूकस कर प्रयोग करे .
- सुबह गर्म पानी पीते समय इसे भी पानी में डाल दे .
- साबुत हल्दी के टुकड़ों को तवे पर भूनकर पीसकर शहद मिलाकर लेने से सर्दी, जुकाम, मौसमी संक्रमण में लाभ
होता है।
- इसके टुकड़े अचार में डाले . एक अनोखे स्वाद वाला अचार तैयार हो जाएगा .छिली हुई कद्दूकस की हल्दी और कटी हुई हरी मिर्च को ,हल्दी नमक,राई की दाल ,नीबू का रस ,काला नमक ,जीरा पावडर,मिलाकर कांच की बरनी में १२ घंटे के लिए बंद कर धूप मैं रख दें.दुसरे दिन तेल मैं हिंग और मेथी दाने से तडका देकर ,ठंडा कर के अचार मैं मिक्स कर दें .अचार तैयार है तुरत या दो घंटे बाद आलू.मेथी या पालक के परांठों के साथ खाइए.इसे फ्रिज मैं रखे न तो ज्यादा दिनों तक चलेगा.
- इसकी सब्जी खाने से भयंकर सर्दी में भी कोई परेशानी नहीं होती .हल्दी की सब्जी में प्रयुक्त होने वाली सामग्री -
1-कच्ची (गीली) हल्दी की गांठे 500 gm
2-अदरक 200 gm
3-प्याज 250 gm
4-लहसुन 30 gm
5-टमाटर 500 gm
6-हरी मिर्च
7-दही 750 gm
8-देशी घी 500 gm
मिर्ची पाउडर,नमक,धनिया,जीरा,सौंफ,साबुत गर्म मसाला

हल्दी की सब्जी बनाने के लिए तैयारी-
1-सबसे पहले कच्ची हल्दी की गांठों को छीलकर कस लें (जैसे गाजर का हलवा बनाने के लिए गाजर को कस्तें है) |
2-अदरक को भी छीलकर कस लें और एक बर्तन में रख दें |
3-प्याज को छीलकर गोल कटिंग करें जैसे सलाद के लिए करते है |
4-लहसुन को छीलकर बारीक पीस कर एक कटोरी में रखलें |
5-टमाटर काटें (एक टमाटर के दो या तीन टुकडें ही करें) टमाटर ताजे होने चाहिए पिचके हुए नहीं |
6-हरी मिर्च को चीरा लगाकर उसके अन्दर से बीज निकाल दें व उसके चार टुकड़े कर लें |

उपरोक्त तैयारी करने के बाद अब सब्जी बनाना शुरू करतें है -
1-कड़ाही में घी गर्म करें व उसमे कसी हुई हल्दी को तब तक तलें जब तक हल्दी का रंग में हल्का भूरापन आ जाए | आंच को मंदा रखें | तलने के बाद तली हल्दी को घी से बाहर निकालकर एक बर्तन में रख दें |
2-अब उसी घी में प्याज भुनें तब तक जब तक प्याज का रंग गुलाबीपन पर आ जाएँ | भूनने के बाद प्याज को निकालकर एक अलग बर्तन में निकाल लें |
3-अब 3/4 किलो दही को एक बर्तन में लें व उसमे अपने स्वाद के हिसाब से मिर्ची पाउडर,धनिया,नमक आदि मसाले डालकर अच्छी तरह फैंट कर मिला लें |(बर्तन सिल्वर या कांसे का प्रयोग करें )|
4-अब एक दुसरे बर्तन (कड़ाही)में जो कांसे या सिल्वर का हो में उपरोक्त तलने के बाद बचे घी को छानकर गर्म करें और गर्म होते ही उसमे सौंफ,अदरक ,गर्म मसाला ,थोडा जीरा ,पीसा हुआ लहसुन,मिर्ची के कटे टुकड़े डालकर फ्राई करें | हल्का फ्राई होने के बाद दही में तैयार किया हुआ मसाला डाले दें | और इसमें उबाल आने के बाद आंच धीमी करके उसे तब तक पकाएं जब तक दही का पानी पूरी तरह से सुख ना जाएँ | पानी सुखते ही इसमें हिलाए जाने वाले चम्मच पर घी की मात्रा दिखाई देने लग जाएगी व दही की जाली बन जाएगी |
5-अब इस मसाले में उपरोक्त तली हुई सामग्री (हल्दी व प्याज) डाल दें व एक उबाल आने दें |
6-पहले उबाल के बाद कटे हुए टमाटर व हरा धनिया डालकर एक बार हिला दें व बर्तन का ढक्कन बंद कर चूल्हे से उतार लें , उतारने के बाद लगभग बीस मिनट तक ढक्कन ना हटायें |
अब आपकी स्वास्थ्यवर्धक स्वादिष्ट हल्दी की सब्जी तैयार है |

हल्दी की सब्जी खाने का देशी नुस्खा -आमतौर पर हमारे घरों में पतली रोटी बनती है पर हल्दी की सब्जी के साथ खाने के लिए रोटी मोटी बनवाएँ , एक या दो रोटी को थाली में रखकर उसके ऊपर सब्जी डालें व दूसरी रोटी से सब्जी खाएं , थाली में सब्जी के नीचे रखी रोटियां अंत में खाएं |

उम्रदराज लोग सर्दियों में कच्ची हल्दी की सब्जी का सेवन जरुर करें

चेतावनी - हल्दी की सब्जी में घी की मात्रा अधिक होती है साथ ही ये सर्दियों में बनती है इसलिए सब्जी खाने के तुरंत बाद पानी ना पीयें, वरना गला ख़राब हो सकता है |बहुत ज्यादा प्यास लगने पर गुनगुना पानी पीयें और पानी पीने से पहले एक पापड़ जरुर खाएं |



शहद का सेवन करने के नियम
शहद कभी खराब नहीं होता . यह पका पकाया भोजन है और तुरंत ऊर्जा देने वाला है . पर इसे लेते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए .
- अमरुद , गाना
, अंगूर और खट्टे फलों के साथ शहद अमृत के सामान है .
- चाय कॉफ़ी के साथ शहद ज़हर के सामान है .
- शहद को आग पर कभी ना तपाये .
- मांस -मछली के साथ शहद का सेवन ज़हर के सामान है .
- शहद में पानी या दूध बराबर मात्रा में हानि कारक है .
- चीनी के साथ शहद मिलाना अमृत में ज़हर मिलाने के सामान है .
- एक साथ अधिक मात्रा में शहद लेना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है .दिन में २ या ३ बार एक चम्मच शहद लें .
- घी , तेल , मक्खन में शहद ज़हर के सामान है .
- शहद खाने से कोई परेशानी महसूस हो तो निम्बू का सेवन करें .
- समान मात्रा में घी और शहद ज़हर होता है .
- अलग अलग वृक्षों पर लगे छत्तों में प्राप्त शहद के अलग अलग औषधीय गुण होंगे . जैसे नीम पर लगा शहद आँखों के लिए , जामुन का डायबिटीज़ और सहजन का ह्रदय , वात और रक्तचाप के लिए अच्छा होता है .
- शीतकाल या बसंतऋतु में विकसित वनस्पति के रस में से बना हुआ शहद उत्तम होता है और गरमी या बरसात में एकत्रित किया हुआ शहद इतना अच्छा नही होता है। गांव या नगर में मुहल्लों में बने हुए शहद के छत्तों की तुलना में वनों में बनें हुए छत्तों का शहद अधिक उत्तम माना जाता है।
- शहद पैदा करनें वाली मधुमक्खियों के भेद के अनुसार वनस्पतियों की विविधता के कारण शहद के गुण, स्वाद और रंग में अंतर पड़ता है।
- शहद सेवन करने के बाद गरम पानी भी नहीं पीना चाहिए।
- मोटापा दूर करने के लिए गुनगुने पानी में और दुबलापन दूर करने के लिए गुनगुने दूध के साथ ले .
- अधिक धुप में शहद ना दे . गरमी से पीड़ित व्यक्ति को गरम ऋतु में दिया हुआ शहद जहर की तरह कार्य करता है।
- शहद को जिस चीज के साथ लिया जाये उसी तरह के असर शहद में दिखाई देते है। जैसे गर्म चीज के साथ लें तो- गर्म प्रभाव और ठंडी चीज के साथ लेने से ठंडा असर दिखाई देता है। इसलिए मौसम के अनुसार वस्तुएं शहद के साथ ले .
- ज्यादा मात्रा में शहद का सेवन करने से ज्यादा हानि होती है। इससे पेट में आमातिसार रोग पैदा हो जाता है और ज्यादा कष्ट देता है। इसका इलाज ज्यादा कठिन है। फिर भी यदि शहद के सेवन से कोई कठिनाई हो तो 1 ग्राम धनिया का चूर्ण सेवन करके ऊपर से बीस ग्राम अनार का सिरका पी लेना चाहिए।बच्चे बीस से पच्चीस ग्राम और बड़े चालीस से पचास ग्राम से अधिक शहद एक बार में न सेवन करें। लम्बे समय तक अधिक मात्रा में शहद का सेवन न करें।
- चढ़ते हुए बुखार में दूध, घी, शहद का सेवन जहर के तरह है। यदि किसी व्यक्ति ने जहर या विषाक्त पदार्थ का सेवन कर लिया हो उसे शहद खिलाने से जहर का प्रकोप एक-दम बढ़कर मौत तक हो सकती है।
शहद का सेवन करने के नियम
शहद कभी खराब नहीं होता . यह पका पकाया भोजन है और तुरंत ऊर्जा देने वाला है . पर इसे लेते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए .
- अमरुद , गाना
 , अंगूर और खट्टे फलों के साथ शहद अमृत के सामान है .
- चाय कॉफ़ी के साथ शहद ज़हर के सामान है .
- शहद को आग पर कभी ना तपाये .
- मांस -मछली के साथ शहद का सेवन ज़हर के सामान है .
- शहद में पानी या दूध बराबर मात्रा में हानि कारक है .
- चीनी के साथ शहद मिलाना अमृत में ज़हर मिलाने के सामान है .
- एक साथ अधिक मात्रा में शहद लेना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है .दिन में २ या ३ बार एक चम्मच शहद लें .
- घी , तेल , मक्खन में शहद ज़हर के सामान है .
- शहद खाने से कोई परेशानी महसूस हो तो निम्बू का सेवन करें .
- समान मात्रा में घी और शहद ज़हर होता है .
- अलग अलग वृक्षों पर लगे छत्तों में प्राप्त शहद के अलग अलग औषधीय गुण होंगे . जैसे नीम पर लगा शहद आँखों के लिए , जामुन का डायबिटीज़ और सहजन का ह्रदय , वात और रक्तचाप के लिए अच्छा होता है .
- शीतकाल या बसंतऋतु में विकसित वनस्पति के रस में से बना हुआ शहद उत्तम होता है और गरमी या बरसात में एकत्रित किया हुआ शहद इतना अच्छा नही होता है। गांव या नगर में मुहल्लों में बने हुए शहद के छत्तों की तुलना में वनों में बनें हुए छत्तों का शहद अधिक उत्तम माना जाता है।
- शहद पैदा करनें वाली मधुमक्खियों के भेद के अनुसार वनस्पतियों की विविधता के कारण शहद के गुण, स्वाद और रंग में अंतर पड़ता है।
- शहद सेवन करने के बाद गरम पानी भी नहीं पीना चाहिए।
- मोटापा दूर करने के लिए गुनगुने पानी में और दुबलापन दूर करने के लिए गुनगुने दूध के साथ ले .
- अधिक धुप में शहद ना दे . गरमी से पीड़ित व्यक्ति को गरम ऋतु में दिया हुआ शहद जहर की तरह कार्य करता है।
- शहद को जिस चीज के साथ लिया जाये उसी तरह के असर शहद में दिखाई देते है। जैसे गर्म चीज के साथ लें तो- गर्म प्रभाव और ठंडी चीज के साथ लेने से ठंडा असर दिखाई देता है। इसलिए मौसम के अनुसार वस्तुएं शहद के साथ ले .
- ज्यादा मात्रा में शहद का सेवन करने से ज्यादा हानि होती है। इससे पेट में आमातिसार रोग पैदा हो जाता है और ज्यादा कष्ट देता है। इसका इलाज ज्यादा कठिन है। फिर भी यदि शहद के सेवन से कोई कठिनाई हो तो 1 ग्राम धनिया का चूर्ण सेवन करके ऊपर से बीस ग्राम अनार का सिरका पी लेना चाहिए।बच्चे बीस से पच्चीस ग्राम और बड़े चालीस से पचास ग्राम से अधिक शहद एक बार में न सेवन करें। लम्बे समय तक अधिक मात्रा में शहद का सेवन न करें।
- चढ़ते हुए बुखार में दूध, घी, शहद का सेवन जहर के तरह है। यदि किसी व्यक्ति ने जहर या विषाक्त पदार्थ का सेवन कर लिया हो उसे शहद खिलाने से जहर का प्रकोप एक-दम बढ़कर मौत तक हो सकती है।





गीली हल्दी ---
इन दिनों बाज़ार में गीली हल्दी उपलब्ध होती है जो दिखने में अदरक की तरह होती है . इसके सेवन के कई लाभ है ----
- इसमें करक्यूमिन होता है जो केंसर से लड़ता है . इसलिए केंसर के रोगी इसका रस सुबह खाली पेट अवश्य ले .
- यह बुढापे से द
ूर रखता है . अंदरूनी चोटों को भी ठीक करता है .
- इसका एक टुकडा मुंह में रखने से गले की खराश , खांसी , ज़ुकाम , दमा आदि दूर होता है .
- दिन गीली हल्दी मिले , खाना बनाने में इसी को कद्दूकस कर प्रयोग करे .
- सुबह गर्म पानी पीते समय इसे भी पानी में डाल दे .
- साबुत हल्दी के टुकड़ों को तवे पर भूनकर पीसकर शहद मिलाकर लेने से सर्दी, जुकाम, मौसमी संक्रमण में लाभ
होता है।
- इसके टुकड़े अचार में डाले . एक अनोखे स्वाद वाला अचार तैयार हो जाएगा .छिली हुई कद्दूकस की हल्दी और कटी हुई हरी मिर्च को ,हल्दी नमक,राई की दाल ,नीबू का रस ,काला नमक ,जीरा पावडर,मिलाकर कांच की बरनी में १२ घंटे के लिए बंद कर धूप मैं रख दें.दुसरे दिन तेल मैं हिंग और मेथी दाने से तडका देकर ,ठंडा कर के अचार मैं मिक्स कर दें .अचार तैयार है तुरत या दो घंटे बाद आलू.मेथी या पालक के परांठों के साथ खाइए.इसे फ्रिज मैं रखे न तो ज्यादा दिनों तक चलेगा.
- इसकी सब्जी खाने से भयंकर सर्दी में भी कोई परेशानी नहीं होती .हल्दी की सब्जी में प्रयुक्त होने वाली सामग्री -
1-कच्ची (गीली) हल्दी की गांठे 500 gm
2-अदरक 200 gm
3-प्याज 250 gm
4-लहसुन 30 gm
5-टमाटर 500 gm
6-हरी मिर्च
7-दही 750 gm
8-देशी घी 500 gm
मिर्ची पाउडर,नमक,धनिया,जीरा,सौंफ,साबुत गर्म मसाला

हल्दी की सब्जी बनाने के लिए तैयारी-
1-सबसे पहले कच्ची हल्दी की गांठों को छीलकर कस लें (जैसे गाजर का हलवा बनाने के लिए गाजर को कस्तें है) |
2-अदरक को भी छीलकर कस लें और एक बर्तन में रख दें |
3-प्याज को छीलकर गोल कटिंग करें जैसे सलाद के लिए करते है |
4-लहसुन को छीलकर बारीक पीस कर एक कटोरी में रखलें |
5-टमाटर काटें (एक टमाटर के दो या तीन टुकडें ही करें) टमाटर ताजे होने चाहिए पिचके हुए नहीं |
6-हरी मिर्च को चीरा लगाकर उसके अन्दर से बीज निकाल दें व उसके चार टुकड़े कर लें |

उपरोक्त तैयारी करने के बाद अब सब्जी बनाना शुरू करतें है -
1-कड़ाही में घी गर्म करें व उसमे कसी हुई हल्दी को तब तक तलें जब तक हल्दी का रंग में हल्का भूरापन आ जाए | आंच को मंदा रखें | तलने के बाद तली हल्दी को घी से बाहर निकालकर एक बर्तन में रख दें |
2-अब उसी घी में प्याज भुनें तब तक जब तक प्याज का रंग गुलाबीपन पर आ जाएँ | भूनने के बाद प्याज को निकालकर एक अलग बर्तन में निकाल लें |
3-अब 3/4 किलो दही को एक बर्तन में लें व उसमे अपने स्वाद के हिसाब से मिर्ची पाउडर,धनिया,नमक आदि मसाले डालकर अच्छी तरह फैंट कर मिला लें |(बर्तन सिल्वर या कांसे का प्रयोग करें )|
4-अब एक दुसरे बर्तन (कड़ाही)में जो कांसे या सिल्वर का हो में उपरोक्त तलने के बाद बचे घी को छानकर गर्म करें और गर्म होते ही उसमे सौंफ,अदरक ,गर्म मसाला ,थोडा जीरा ,पीसा हुआ लहसुन,मिर्ची के कटे टुकड़े डालकर फ्राई करें | हल्का फ्राई होने के बाद दही में तैयार किया हुआ मसाला डाले दें | और इसमें उबाल आने के बाद आंच धीमी करके उसे तब तक पकाएं जब तक दही का पानी पूरी तरह से सुख ना जाएँ | पानी सुखते ही इसमें हिलाए जाने वाले चम्मच पर घी की मात्रा दिखाई देने लग जाएगी व दही की जाली बन जाएगी |
5-अब इस मसाले में उपरोक्त तली हुई सामग्री (हल्दी व प्याज) डाल दें व एक उबाल आने दें |
6-पहले उबाल के बाद कटे हुए टमाटर व हरा धनिया डालकर एक बार हिला दें व बर्तन का ढक्कन बंद कर चूल्हे से उतार लें , उतारने के बाद लगभग बीस मिनट तक ढक्कन ना हटायें |
अब आपकी स्वास्थ्यवर्धक स्वादिष्ट हल्दी की सब्जी तैयार है |

हल्दी की सब्जी खाने का देशी नुस्खा -आमतौर पर हमारे घरों में पतली रोटी बनती है पर हल्दी की सब्जी के साथ खाने के लिए रोटी मोटी बनवाएँ , एक या दो रोटी को थाली में रखकर उसके ऊपर सब्जी डालें व दूसरी रोटी से सब्जी खाएं , थाली में सब्जी के नीचे रखी रोटियां अंत में खाएं |

उम्रदराज लोग सर्दियों में कच्ची हल्दी की सब्जी का सेवन जरुर करें

चेतावनी - हल्दी की सब्जी में घी की मात्रा अधिक होती है साथ ही ये सर्दियों में बनती है इसलिए सब्जी खाने के तुरंत बाद पानी ना पीयें, वरना गला ख़राब हो सकता है |बहुत ज्यादा प्यास लगने पर गुनगुना पानी पीयें और पानी पीने से पहले एक पापड़ जरुर खाएं |